अकेला
अकेला,
अपने ही बंधनों में
बंधा रहा हूँ मैं,
दीवारें,
मेरे भीतर की
मुझे रोक लेती है अक्सर
मुझे बंधन तोड़ लेने से,
इक दर्द, इक डर
मेरे मन के इर्द-गिर्द
फिरता रहता-घिरता रहता
बुलबुले सा उठता रहता,
मैं तोड़ नहीं सकता बंधन
फांद नहीं सकता
परंपराओं की दीवार
रिश्तों की दीवार।
जीवन के अंधेरों में
कभी रौशनी भी होती है
कोई सूरज दिखाई देता है
मन की खिड़कियों से
फिर मैं खोजता हूँ
कुछ अपने वाले रिश्ते
अपने वाले लोग,
बड़ी बेरुखी सी मिलती है
मेरी नजरों को,
मेरे बंधनों को तोड़ने
वही बुलबुले उठते हैं
फिर मिट जाते हैं
और मैं रह जाता हूँ
इस जीवन के आसरे में
नितांत अकेला
बस अकेला
अपने ही बंधनों में
बंधा रहा हूँ मैं,
दीवारें,
मेरे भीतर की
मुझे रोक लेती है अक्सर
मुझे बंधन तोड़ लेने से,
इक दर्द, इक डर
मेरे मन के इर्द-गिर्द
फिरता रहता-घिरता रहता
बुलबुले सा उठता रहता,
मैं तोड़ नहीं सकता बंधन
फांद नहीं सकता
परंपराओं की दीवार
रिश्तों की दीवार।
जीवन के अंधेरों में
कभी रौशनी भी होती है
कोई सूरज दिखाई देता है
मन की खिड़कियों से
फिर मैं खोजता हूँ
कुछ अपने वाले रिश्ते
अपने वाले लोग,
बड़ी बेरुखी सी मिलती है
मेरी नजरों को,
मेरे बंधनों को तोड़ने
वही बुलबुले उठते हैं
फिर मिट जाते हैं
और मैं रह जाता हूँ
इस जीवन के आसरे में
नितांत अकेला
बस अकेला
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