भोर की सांझ

भोर के जनमने से
ढलती साँझ तक
अनेकवर्णी आकाश को
मैनें देखा है रँग बदलते
तुम्हारे ही कारण
तुम्हारे आँखों की उजास
और होंठों की मुस्कान
भोर का आकाश रचते हैं
तुम्हारी प्रथम दृष्टि से ही
मन के आकाश में
सुनहरा सूर्य उगता है
स्नेह मेरे
जब तुम निर्द्वन्द हँसते हो
दिन चढ़ने लगता है सीढ़ियाँ
नीली स्याही वाली काली कलम को थामे
तुम्हारी उंगलियाँ
परिपक़्व हो रहे दिन के पृष्ठ पर
अनवरत चल रही हैं,
देखो न प्राण....!
आकाश का रँग फिरोजी हो गया है
और तुम्हारी उँगलियों की छुवन से
सफेद बादलों की चिट्ठियाँ
पर लगा कर उड़ रही हैं....।
तुम्हारे उन्नत मस्तक पर
चमक उठी ये स्वेद-बूंदें
संध्या के आगमन का संदेश हैं
आसमान का रँग
फिर बदल रहा है
पिघलता हुआ स्वर्ण
लालिमा में घुल रहा है....।
तुम पूरा का पूरा आकाश उठाये
अपने कंधोँ पर
मुझसे मिलने को आते हो
और तुम्हारे काँधे पर टिका आकाश
सुरमई हो रहा है
तुम्हारी काली कलम
और नीली स्याही
घुल-घुल गई है
साँझ के आकाश में
सँझा सुरमई हो गई है
और तुमने देखा क्या
मेरे प्यार.....!
मेरी सूनी आँखों में
तुम्हारे प्यार का काजल
उतर आया है
नेह का रँग और गहराया है....

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