वो खास बात

वो ख़ास बात..
कितनी ही हैं
ढेर सारी बातें और
चीज़ें तुम्हारी जो
तुम्हारे बिना भी याद रहती हैं,
मिलते हो जब
ख़्यालों में आकर
और जब निकल जाते हो
मुझे तन्हा छोड़कर,
मैं फ़िर भी अक्सर
तन्हा नहीं होता
कि चुन लेता हूँ
तुम्हारी अदाओं को साथी की तरह,
जैसे बिना बात रूठना
और मान जाना फ़िर
ख़ुद से ही अपने आप
शरारतें और समझदारी भी
लेकिन सुनो
सबसे ख़ूबसूरत जो है
तुम्हारी बात और अदा
कहते हुए भी देखो मुस्कुरा रहा हूँ,
वही एक बात जो तुम
अक्सर ही दोहराती हो
अचानक बातें करते-करते
जाने कैसे ख़ुद-ब-ख़ुद करती हो,
बिखरे हुए बालों को समेटकर
हाथों को उठाकर अपने
पीछे ले जाकर सर के
बाँध लिया करती हो,
कह नहीं सकता कि
कितने गुना बढ़ जाती है
वो ख़ूबसूरती तुम्हारी
बस ठीक उसी बाल बाँधते वक़्त,
जैसे कहीं गिरी हो
पहले मौसम की
पहली बारिश की
कोई एक बूँद पहली सी,
मचल उठता है मन
कि भर लूँ बाहों में
और महक उठूँ
तुम्हारे हर रोम की ख़ुशबू में,
ऐसे तो न जाने कितनी ही
बातें हैं, चीज़ें हैं
लेकिन ये एक ख़ास है
एक कशिश, एक इश्क़ है इसमें,
और मैं जैसे
हर बात मानकर
बेबस हो जाया करता हूँ
जब कभी यूँ कुछ कहती हो तुम,
अभी तो न जाने कितना है
और क्या-क्या है फ़िर भी
थोड़ा कहा है
कि तुम थोड़ी भी कहाँ कम हो,
तुम्हारी तो हर अदा
जैसे नश्तर सी गुज़रती है
और यूँ बिखरे बालों को समेटना
बस क़त्ल ही कर देती हो मानो,
और इसीलिए तो
तुम्हारे तसव्वुर के साथ होना
अकेलेपन को फटकने नहीं देता
और मैं तन्हा होकर भी
तुम सा महकता हूँ

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