प्रेम
प्रेम..
प्रेम एक चक्र सा है
शुरू होता है
लेकिन ख़त्म नहीं
कई बार गुज़रता ज़रूर है
कुछ पड़ावों से ठहरकर भी
लेकिन रुक जाना स्वभाव नहीं,
प्रेम की निरंतरता अनंत है
कि चक्र चलता है
इसीलिए तो चक्र है
और प्रेम बहता है
इसीलिए तो प्रेम है,
प्रेम की बात उससे कीजिए
जो प्रेम को गुनता हो
सुनने वाले से करेंगे
तो एक भ्रम ही कहेगा
और करने वाले से करेंगे
तो वो उतर जायेगा
कंठ तक प्रेम के दरिया में❤❤
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