तङप



तड़प..

हाँ जानता हूँ
कि पसंद है
या यूँ कहुँ कि इश्क़ है
मेरे लिखे हर लफ्ज़ और
हर एक हर्फ़ से तुम्हें,

जानता हूँ ये भी
कि तुम मसोस कर
रह जाती हो मन को अपने
कि लफ़्ज़ों की जादूगरी
तुम कर नहीं पातीं
और कह नहीं पातीं
जो कहना हो तुम्हें मुझसे,

जानता हूँ कि कितना-कुछ
जो चल रहा होता है
गहरे कहीं भीतर तुम्हारे
और उबल रहा हो
दरिया जैसे एहसासों का
लेकिन अल्फ़ाज़
सूझते न हों कह देने को,

मैं जानता हूँ
कि तुम्हारे एहसास
ढल भले न पाते हों
लफ़्ज़ों में सही
कि मेरे हर लफ्ज़ से जो
इश्क़ है तुम्हारा
बयां न हो पाता हो भले ही,

तुम सोचती होगी
ज़ाहिर हो भी तो कैसे
मेरे लफ़्ज़ों के प्रति मोह
और न जाने कैसे-कब
मैं समझ सकूँगा
ये पागलपन, ये तड़प
मुहब्बत का दरिया तुम्हारा,

लेकिन तुम्हें पता है
जो तुम जानती नहीं
कि तुम्हारी ख़ामोशियाँ भी
कहीं ज़्यादा रूमानी हैं
मेरे लफ़्ज़ों से
कि तुम्हारे होने की महक ही
काफ़ी है किसी इश्क़ से बढ़कर,

तुम्हें पता न हो लेकिन
बिन बोले ख़ामोश ही तो
तुम्हारा होना ही काफ़ी है
तुम्हें मेरे लफ़्ज़ों से
होगा ये जानता हूँ लेकिन
मुझे तो इश्क़ तुम्हारे
हर ख़्याल से है, ख़्वाब से है
और सुनो तुम ही तो हो
मेरे हर लफ्ज़ में
और मेरे हर हर्फ़ में भी

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