इस पड़ाव पर

इस पड़ाव पर
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गहरा है शोर
बजती हैं ढ़पलियां
अलग अलग
राग सुर और तीव्रता से .
टूटे आइनों से झलकते हैं अक्स
समय , काल ,युगों के
आयामों से मुक्त ,
चीखता है बीच बीच में
एक यूनानी बूढा
खुद को पहचानो , खुद को पहचानो ,
और घुल जाता है नक्कारखाने में .
मृत शब्दों के ढेर पर
लड़ रहे हैं आदिमानव ,
फोड़ते खोपड़ियां ,
छितराते मांस और रक्तगंध ,
यह युद्ध ,
मोक्ष के पाठ्यक्रम को
तय करने के हक़ का है .
उड़ गए हैं पक्षी
बस हिल रही हैं टहनियां ,
चलायमान जगत में
स्थिर है तो सिर्फ
भाषा ,विचार , ज्ञान की लाश पर
गहरा धंसा प्रश्नचिन्ह .......!

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